ISBN : 978-93-7462-864-5
Category : Non Fiction
Catalogue : Social
ID : SB21956
Paperback
370.00
e Book
185.00
Pages : 156
Language : Hindi
“महिलाओं का मासिक धर्म : अपवित्रता की धारणा और यथार्थ” यह पुस्तक महिलाओं के मासिक धर्म से जुड़ी “अपवित्रता” की धारणा और उसके वैज्ञानिक व मानवीय यथार्थ के बीच अंतर को दर्शाती है। मासिक धर्म को भारतीय परम्पराओं में अशुद्धता, प्रतिबंध और निषेध की दृष्टि से देखा गया। परिणामत:, महिलाओं को धार्मिक, सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर भेदभाव का सामना करना पड़ा। इस पुस्तक में एक सामाजिक प्रश्न उठाया गया है कि कैसे एक प्राकृतिक जैविक प्रक्रिया को अपवित्र माना गया? इस सोच ने महिलाओं के आत्म-सम्मान और अधिकारों को प्रभावित किया। यह पुस्तक मासिक धर्म से जुड़े सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक मिथकों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करती है कि कैसे एक अधूरी समझ ने मासिक धर्म को रहस्य और डर से जोड़ दिया। इन धारणाओं के कारण महिलाओं को धार्मिक एवं सांस्कृतिक अनुष्ठानों, पूजा-पाठ, व्रत, रसोई घर, सामाजिक भागीदारी से अलग रखा गया, जिससे उनके आत्म-सम्मान पर गहरा असर पड़ा। यह धारणाएँ पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचनाओं का परिणाम है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान इन धारणाओं का खण्डन करते हुए मासिक धर्म को प्राकृतिक और सामान्य शारीरिक प्रक्रिया के रूप में दर्शाता है। मासिक धर्म से संबन्धित भ्रांतियों ने समाज में इसे शर्म का विषय बना दिया जिसके कारण किशोरियों और महिलाओं को स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा में बाधाओं और सामाजिक सहभागिता से वंचित होना पड़ता है। शर्म की भावना, स्वच्छता की कमी और वैज्ञानिक जानकारी का अभाव स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को उत्पन्न करती है। सकारात्मक सोच और खुलकर संवाद करना महिलाओं को सशक्त बनाता है। इस पुस्तक के माध्यम से वास्तविकता को बताने का प्रयास किया गया है कि अपवित्रता की अवधारणा के स्थान पर सम्मान, स्वास्थ्य और समानता की दृष्टिकोण को स्थापित करना है। यह सामाजिक परिवर्तन के लिए उत्तेजित करती है कि मासिक धर्म को दोष नहीं, बल्कि सृजनात्मक शक्ति के रूप में स्वीकार किया जाए। यह पुस्तक विध्यार्थियों, शिक्षकों, स्वास्थ्यकर्मियों और सामाजिक परिवर्तन में रुचि रखने वाले सभी पाठकों के लिए एक संवेदनशील, तथ्यपरक और जागरूकता बढ़ाने वाला दस्तावेज़ है।