About Book
कभी-कभी मनुष्य दो लोगों के बीच नहीं फँसता—
वह अपने ही दो हिस्सों के बीच खड़ा होता है।
एक ओर वह प्रेम होता है जो भीतर तूफ़ान जगा देता है।
दूसरी ओर वह अपनापन, जो जीवन को स्थिरता देता है।
और सबसे कठिन प्रश्न यह नहीं होता कि किसे चुना जाए,
बल्कि यह कि उस चयन के बाद अपने भीतर क्या बचा रह जाएगा।
यह केवल प्रेम की कहानी नहीं है।
यह अधिकार और समर्पण की कहानी है।
प्रतीक्षा और अपराधबोध की कहानी है।
उन निर्णयों की कहानी है जिन्हें टालते-टालते मनुष्य स्वयं से दूर होता चला जाता है।
नदी के बीच दो नावों पर खड़ा एक आदमी—
क्या दोनों को बचा सकता है?
या अंततः उसे किसी एक को नहीं,
अपने ही एक हिस्से को खोना पड़ता है?
"शून्य के बीच" एक ऐसी साहित्यिक लघु-उपन्यास है जो प्रेम के पार जाकर मनुष्य के भीतर के विभाजन, उसकी असमर्थताओं और आत्मबोध की यात्रा को स्पर्श करती है।
शायद अंत में प्रश्न यह नहीं रह जाता कि उसने किसे चुना—
प्रश्न यह रह जाता है कि क्या उसने स्वयं को कभी पाया।
About Author
"प्रभात कुमार" एक लेखक, बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े कार्यरत पेशेवर तथा मानवीय मनोविज्ञान के गंभीर अध्येता हैं। उनकी रुचि सदैव मनुष्य के मन, भावनाओं, संबंधों और आत्मबोध की जटिलताओं को समझने में रही है। यही जिज्ञासा उनके लेखन की मूल प्रेरणा भी है।
पिछले एक दशक से वे मनोविज्ञान, दर्शन और न्यूरो-लिंग्विस्टिक प्रोग्रामिंग (NLP) का अध्ययन एवं अभ्यास करते रहे हैं। उनका विश्वास है कि जीवन के अनेक प्रश्नों के उत्तर केवल तर्क से नहीं, बल्कि अनुभव, संवेदना और आत्ममंथन से प्राप्त होते हैं। यही दृष्टि उनके लेखन को विशिष्ट बनाती है।
उनकी पहली पुस्तक मानसिक स्वास्थ्य और अवसाद की गहन पड़ताल करते हुए आशा, संवेदना और आत्मविश्वास की दिशा में एक सार्थक प्रयास थी। प्रस्तुत पुस्तक के साथ उन्होंने साहित्यिक कथा-साहित्य की ओर कदम बढ़ाया है।
"शून्य के बीच" उनकी दूसरी पुस्तक है, जिसमें संकलित दो साहित्यिक लघु-उपन्यास "साँझ" और "दो नावों का यात्री" प्रेम, स्मृति, अधिकार, अपराधबोध, आत्मसंघर्ष और आत्मबोध जैसे गहरे मानवीय अनुभवों की पड़ताल करते हैं। इन कथाओं के माध्यम से लेखक किसी निष्कर्ष तक पहुँचने का आग्रह नहीं करते, बल्कि पाठक को स्वयं के भीतर झाँकने और अपने प्रश्नों से संवाद करने का आमंत्रण देते हैं।
प्रभात कुमार का मानना है कि साहित्य का उद्देश्य केवल कहानी कहना नहीं, बल्कि मनुष्य को स्वयं से मिलाना भी है। यदि कोई पुस्तक पढ़ने के बाद पाठक के भीतर एक नया प्रश्न जन्म ले, तो वही उस पुस्तक की सबसे बड़ी उपलब्धि है।