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बाबा दीप सिंह जी शहीद

बाबा दीप सिंह जी शहीद

Real story of a sikh warrior Akali Baba Deep Singh ji. जैसे ही यह शब्द बाबा दीप सिंह जी के कानों में गूँजे, वह उसी क्षण उठ खड़े हुए और उन्होंने आत्मबल से पुनः अपना खण्डा और कटा हुआ सिर उठा लिया ...

शहीद उस कौम का मान-सम्मान होते है जिस में उनका जन्म होता है। वह कौमें भी धन्य हो जाती है जो अपने पूर्वजों के महान कार्यो को अकसर याद करती रहती है। किसी शायर का कथन है "उस कौम को समय नहीं माफ करता, जो मूल्य न तारे कुर्बानियों का।" शहीद तथा शहादत अरबी भाषा के शब्द है। शहादत का शब् दिक अर्थ गवाही देना या साक्षी होना होता है। इस प्रकार शहीद किसी कौम की ओर से दी गई कुर्बानियों के सदीवीं व सच्चे गवाह होते है। दीन दुखियोें की रखवाली, सत्य धर्म एवंम मानवता के लिए देश, कौम तथा समाज ऊपर आए सकटों का प्रसन्तापूर्वक स्वागत करना, इन संकटों का डट कर मुकाबला करना, इस मुकाबले के किसी निर्णायक मोड़ आने तक अपने कदम पीछे न करना तथा अपने मनोबल तथा मनोरथ की सिद्धी के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर कर देना शहीदों की पहचान होती है। यह पहचान मौत की वादियों से गुज़र कर ही करवाई जा सकती है। क्योंकि "सूरा सो पहिचानिअै जु लरे दीन के हेत। पुरजा पुरजा कटि मरै कबहू न छाडै खेत।"
इस प्रकार शहीद की आत्मा निर्मल तथा उदेश्य स्पष्ठ होता है, जिस को भाई गुरदास जी इस तरह प्रमाणित करते हैः- "सबर सिदक शहीद भरम भऊ खोहणा"। शहीद फौलादी इरादे का मालिक होता है, जिसके विचारों को बदला नहीं जा सकता। इस तरह के इरादे तथा विचारों की मलकीयत रखने वाले थे बाबा दीप सिंह जी शहीद।
बाबा दीप सिंह जी का जन्म 26 जनवरी, 1682 ईस्वी को गाँव पहूविंड जिला श्री अमृतसर साहिब जी में हुआ। बाबा दीप सिंह जी की माता का नाम जीऊणी एवं पिता का नाम भक्तू जी था। बचपन में माता-पिता बाबा दीप सिंह जी को दीपा नाम से पुकारते थे। 1699 ईस्वी की वैशाखी के शुभ अवसर माता-पिता के साथ बाबा दीप सिंह 16 वर्ष की तरुण आयु में आनन्दपुर साहिब गए एवं गुरू गोबिन्द सिंह जी के दर्शन के बाद उन्हीं दिनों अमृतधारण किया और उस नये वातावरण में आनन्दित होने लगे।
गुरु गोबिन्द सिंह के आशीर्वाद से भिन्न भिन्न दायित्वों पर अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया। गुरु गोबिन्द सिंह जी ने बाबा दीप सिंह जी से गुरु ग्रन्थ साहिब में गुरबाणी लिखाई थी क्योंकि बाबा दीप सिंह जी लिखते बहुत अच्छा थे। अमृतसर संचार और गुरमत प्रचार का काम दमदमी टकसाल का दायित्व था। दीप सिंह जी ने गुरू आज्ञा अनुसार श्री गुरू ग्रँथ साहिब जी की चार प्रतियां तैयार की जिन्हें अलग अलग तख्तों पर स्थापित किया गया। दीप सिंह जी ने इस विद्यालय (सँस्था) का नाम गुरू आशा अनुसार दमदमी टकसाल रखा।
आनन्दपुर साहिब में ही बाबा दीप सिंह ने विद्या प्राप्त की एवं अपनी रूचि अनुसार शस्त्र विद्या सीखी। बाबा दीप सिंह बहुमुखी प्रतिभा के स्वामी थे, इसलिए उनको शीघ्र ही कई प्रकार के अस्त्र-शस्त्र चलाने में निपुणता प्राप्त हो गई।
सन् 1704 के प्रारम्भ में बाबा दीप सिंह के माता-पिता उनसे मिलने आए और गुरू जी से अनुरोध किया कि दीप सिंह को आज्ञा प्रदान की जाए कि वह अपने विवाह के लिए घर वापिस उनके साथ चले परन्तु बाबा दीप सिंह का मन गुरू चरणों में रम गया था। स्थानीय मर्यादा, कीर्तन, कथा, सिंहों की वीरता के कर्त्तव्य और उनकी वेशभूषा ने दीप सिंह जी का मन मोह लिया था, अतः वह इस वातावरण को त्यागकर घर जाने में असहनीय पीड़ा अनुभव कर रहे थे परन्तु गुरू आज्ञा के कारण उन्हें अपने माता-पिता के साथ गृहस्थ आश्रम को अपनाने घर जाना पड़ा। कुछ दिनों पश्चात् जब दीप सिंह जी का ‘आनंद कारज’ (विवाह) हुआ तभी उन्हें समाचार प्राप्त हुआ कि गुरूदेव ने मुगलों से भयँकर युद्ध करते हुए श्री आनन्दपुर साहिब जी त्याग दिया है। शीघ्र ही दीप सिंह जी ने गुरूदेव के विषय में पूर्ण रूप से जानकारी प्राप्त की एवं अपने सहयोगियों सहित गुरूदेव जी के दर्शनों को साबों की तलवंडी पहुँचे और श्री गुरू गोबिन्द सिंह साहिब जी के चरणों में शीश रखकर युद्ध के समय में अनुपस्थित रहने की क्षमा याचना की। तब गुरूदेव ने दीप सिंह जी को अपने सीने से लगाकर कहा कि कोई बात नहीं, अब तुम्हारे जिम्मे और बहुत से कार्य हैं जो कि तुमको भविष्य में पूर्ण करने हैं।
सन् 1709 में उन्होंने बाबा बंदा सिंह बहादुर के साथ मिलकर सरहिंद और सधौरा को मुगलों के अत्याचार से मुक्ति दिलवाई। सन् 1733 में नवाब कपूर सिंह सिंहपुरिया ने उन्हें अपने एक दस्ते का मुखिया बना लिया। सन् 1748 में जब खालसा सिक्खों ने मिस्लों को फिर से संगठित किया तो बाबा दीप सिंह ने शहीदन मिस्ल का नेतृत्व किया। (मिस्लें छोटे-छोटे सिक्ख राजनीतिक क्षेत्र थे, जिनमें शामिल योद्धा मुगलों के अत्याचार से पीड़ित लोगों के लिए काम करते थे)
सन् 1746 ईस्वी में पंजाब के राज्यपाल यहिया खान ने दीवान लखपत राय के नेतृत्त्व में सिक्खों का सर्वनाश करने का अभियान चलाया तो उस संकट के समय दीप सिंह जी ने अपनी सैनिक टुकड़ी के साथ अपने भाइयों की सुरक्षा हेतु साबों की तलवंडी से कान्हूवाल के जंगलों में सहायता के लिए पहुंचे। इस युद्ध को छोटा घल्लूघारा कहा जाता है।
सन् 1756 ईस्वी में जब अहमदशाह अब्दाली ने भारत पर चौथा आक्रमण किया तो उसने बहुत से भारतीय नगरों को लूटा तथा बहुत सी भारतीय नारियों को दासी बनाकर काबुल लौट रहा था तभी बाबा दीप सिंह जी की ‘शहीद मिसल’ की सैनिक टुकड़ी ने कुरूक्षेत्र के पास पिपली तथा मारकंडे के दरिया में छापे मारकर गोरिल्ला युद्ध के सहारे लगभग तीन सौ महिलाओं को स्वतन्त्र करवा लिया और इसके साथ ही कई मूल्यवान वस्तुओं से लदे पशुओं को भी घेरकर वहाँ से हाँक कर अपने क्षेत्र में ले जाने में सफल हो गए। बाबा दीप सिंह जी ने जिन नारियों को आतंकवादियों से छुड़वाया, चाहे वे हिन्दू परिवारों की थी अथवा मुस्लिम परिवारों की, उनकी रक्षा में कोई भेदभाव नहीं किया गया। सिक्खों के ऊँचे आचरण के कारण ही तो ये मुगल बालाएँ पुकारा करती थी:- "मोड़ी बाबा कच्छ वालिया, नहीं ता गई रन वसरे नूं गई" यानि हे बाबा, आगे जाकर शत्रुओं को जरा रोकना, नहीं तो अबलाओं को वे बसरे नगर की ओर भगाकर ले जा रहे हैं।
बाबा दीप सिंह जी ने यह हमला कुरूक्षेत्र में किया था, जिससे बौखलाकर अब्दाली ने अपने बेटे तैमूर शाह को सिक्खों के विनाश का हुक्म दिया। पिता का आदेश पाकर तैमूर शाह ने जगह-जगह गुरुद्वारे और पवित्र स्थानों को नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया। इस दौरान सिक्खों के पवित्र स्थान हरमिंदर साहिब को भी नुकसान पहुंचाया गया। जहान खान ने पवित्र सरोवर में कूड़ा फिंकवा दिया और गायों का वध करके श्री दरबार साहिब जी में रख दिया गया, जिससे कुछ दिनों में पूरे वातावरण में दुर्गन्ध फैल गई। उसने कई भवनों को भी धवस्त कर दिया और चारों तरफ पहरे बैठा दिए। हरमिंदर साहिब को नुकसान पहुंचाए जाने की खबर जब बाबा दीप सिंह को मिली तो उन्होंने नगाड़े पर चोट लगाकर युद्ध के लिए तैयार होने का आदेश दे दिया। तुरन्त समस्त ‘साबों की तलवंडी’ नगर के श्रद्धालु नागरिक इक्ट्ठे हो गए। सभी सिक्खों को सम्बोधित करते हुए बाबा दीप सिंह जी ने धर्म युद्ध का आह्वान करते हुए कहा कि सिक्खों, हमने आताताई से पवित्र हरिमन्दिर साहिब दरबार साहिब के अपमान का बदला अवश्य ही लेना है। मौत को चाहने के लिए शहीदों की बरात चढ़नी है। बाबा जी का आदेश गाँव गाँव पहुँचाया गया। जिससे चारों दिशाओं से सिंघ अस्त्र-शस्त्र लेकर एकत्रित हो गए। उनका आदेश सुनकर तकरीबन 3000 खालसा उनके बेड़े में शामिल हो गए और उन्होंने अमृतसर की ओर कूच किया।
हरमिंदर साहिब को अहमद शाह अब्दाली के कब्जे से छुड़वाने के लिए बाबा दीप सिंह अपनी सेना के साथ काफी बहादुरी से युद्ध कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने खालसा लड़ाकों से कहा कि उनका सिर हरमिंदर साहिब में ही गिरेगा। तरनतारन तक पहुंचते-पहुंचते उनकी सेना में तकरीबन 5000 खालसा योद्धा शामिल हो चुके थे। लाहौर दरबार में सिक्खों की इन तैयारियों की सूचना जैसे ही पहुँची, जहान खान ने घबराकर इस युद्ध को इस्लाम खतरे में है, का नाम लेकर जहादिया को आमन्त्रित कर लिया। हैदरी झण्डा लेकर गाज़ी बनकर अमृतसर की ओर चल पड़े। इस प्रकार उनकी सँख्या सरकारी सैनिकों को मिलाकर बीस हजार हो गई।
अफगान सेनापति जहानखान अपनी सेना लेकर अमृतसर नगर के बाहर गरोवाल नामक स्थान पर सिक्खों से टकराया। सिंघ इस समय श्री दरबार साहिब जी के अपमान का बदला लेने के लिए मरने-मारने पर तुले हुए थे, ऐसे में उनके सामने केवल लूटमार के माल का आश्वासन लेकर लड़ने वाले जेहादी कहां टिक पाते। वे तो केवल बचाव की लड़ाई लड़कर कुछ प्राप्त करना चाहते थे किन्तु यहाँ तो केवल सामने मृत्यु ही मँडराती दिखाई देती थी अतः वे धीरे धीरे भागने में ही अपना भला देखने लगे।
सिक्खों ने ऐसी वीरता से तलवार चलाई कि जहान खान की सेना में भगदड़ मच गई। जगह जगह शवों के ढेर लग गए। जहान खान को सबक सिखाने के लिए बाबा जी का एक निकटवर्ती सिक्ख सरदार दयाल सिंह 500 सिंघों के एक विशेष दल को लेकर शत्रु दल को चीरता हुआ जहान खान की ओर लपका परन्तु जहान खान वहाँ से पीछे हट गया, तभी उनका सामना यकूब खान से हो गया। उन्होंने उसके सिर पर गुरज गदा दे मारा, जिसके आघात से वह वहीं ढेर हो गया। दूसरी तरफ जहान खान का नायब सेनापति जमलशाह आगे बढ़ा और बाबा जी को ललकारने लगा। इस पर दोनों में घमासान युद्ध हुआ, उस समय बाबा दीप सिंह जी की आयु 75 वर्ष की थी जबकि जमाल शाह की आयु लगभग 40 वर्ष की रही होगी। उस युवा सेनानायक से दो दो हाथ जब बाबा जी ने किए तो उनका घोड़ा बुरी तरह से घायल हो गया। इस पर उन्होंने घोड़ा त्याग दिया और पैदल ही युद्ध करने लगे। बाबा जी ने पैंतरा बदलकर एक खण्डे का वार जमाल शाह की गर्दन पर किया, जो अचूक रहा। बाबा दीप सिंह जी और जमाल शाह ने एक दुसरे पर वार किया दोनों की गर्दने कट गई दोनों पक्ष की सेनाएं यह सब कुछ देखकर दंग रह गई। तभी निकट खड़े दयाल सिंह ने बाबा जी को ऊँचे स्वर में चिल्लाकर कहा: बाबा जी,बाबा जी, आपने तो रणभूमि में चलते समय प्रतिज्ञा की थी कि मैं अपना शीश श्री दरबार साहिब जी में गुरू चरणों में भेंट करूँगा, आप तो यहीं रास्ते में शरीर त्याग रहे हैं ?
जैसे ही यह शब्द मृत बाबा दीप सिंह जी के कानों में गूँजे, वह उसी क्षण उठ खड़े हुए और उन्होंने आत्मबल से पुनः अपना खण्डा और कटा हुआ सिर उठा लिया। बाबा दीप सिंह जी एक हथेली पर अपना सिर धर और दूसरे हाथ में खण्डा लेकर फिर से रणक्षेत्र में जूझने लगे। जब शत्रु पक्ष के सिपाहियों ने मृत बाबा जी को शीश हथेली पर लेकर रणभूमि में जूझते हुए देखा तो वे भयभीत होकर अली अली, तोबा तोबा, कहते हुए रणक्षेत्र से भागने लगे और कहने लगे कि हमने जीवित लोगों को तो लड़ते हुए देखा है परन्तु सिक्ख तो मर कर भी लड़ते हैं। हम जीवित से तो लड़ सकते हैं, मृत से कैसे लड़ेंगे ?
यह अद्भुत आत्मबल का कौतुक देखकर सिक्खों का मनोबल बढ़ता ही गया, वे शत्रु सेना पर दृढ़ निश्चय को लेकर टूट पड़े। बस फिर क्या था, शत्रु सेना भय के मारे भागने में ही अपनी भलाई समझने लगी। 15000 से ज्यादा जानें गवा कर शत्रु सेना मैदान से भाग गई। इस युद्ध में सिक्खों की जीत हुई। बाबा दीप सिंह जी श्री दरबार साहिब जी की ओर आगे बढ़ने लगे। श्री दरबार साहिब जी की परिक्रमा में वह आकर गिरे। बाबा दीप सिंह जी ने अपना शीश परक्रमा में इस तरह टिका दिया कि बाबा जी हरमंदिर साहिब की तरफ़ मत्था टेक रहे हों। इस तरह आप ने अपना शीश गुरु जी के चरणो में भेंट करके शहीद हो गए।
बाबा दीप सिंह जी की शहादत 1761 ईस्वी में हुई। जिस जगह पर बाबा ने अपना शीश रखा और अपने प्राण त्यागे इस जगह को शहीद पुंगा कहा जाने लगा। बाबा दीप सिंह ने संसार को बताया कि सिक्ख आत्मबल रहते भी सीमाओं में रहता है परन्तु कभी इसकी आवश्यकता पड़ ही जाए तो इसका सदुपयोग किया जा सकता है।।
*वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह*


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